hello@mukhyansh.com

यात्रा वृत्तांत (एक अजीब कहानी) : रहमत

यात्रा वृत्तांत (एक अजीब कहानी) : रहमत

यात्रा वृत्तांत..(एक अजीब कहानी)

रात के तकरीबन 2 बजे मेरे फ़ोन का रिंग बजने लगा, देखा तो आशीष भैया का काॅल आ रहा था। मैंने फट से कॉल पिक किया।
“हां भैया कैसे हो?” मैंने भैया से पूछा।
“मैं ठीक हूँ, तुम बताओ कैसे हो?”
“मैं भी बिल्कुल ठीक हू्ँ भैया”
“रहमत सुनों! मैं कुछ दिनों से..काफ़ी डिस्टर्ब हूँ। कुछ दिन रेस्ट करना चाहता हूँ, काम भाड़ में जाए। पहाड़ों पर चलते हैं, मैडिटेशन करेंगे।”
“ठीक है भैया मैं टिकट बुक कर लेता हूँ।”

मैंने फ़ोन रख दिया। IRCTC ऐप खोला दिल्ली से देहरादून के लिए ट्रेन सर्च किया। मसूरी एक्सप्रेस पुरानी दिल्ली से रात 10:25 बजे थी। झट से स्लीपर क्लास की दो टिकट बुक कर लिया।

अगली सुबह मैंने आशीष भैया को फ़ोन करके ट्रेन के शेड्यूल के बारे में बता दिया। भैया थोड़ा असहज महसूस करने लगे। कारण पूछने पर पता चला कि बीजेपी के एक नेता हैं योगेश दुबे जी! प्रेस क्लब में शाम को उनका पुरस्कार वितरण का एक बड़ा कार्यक्रम है। जिसमें आशीष भैया योगेश दुबे जी के साथ रहेंगे। अनेक देशों के राजदूत और देश के कई मंत्री और सांसद शिरकत करेंगे। कार्यक्रम देर रात तक चलने की संभावना थी।
“तो भैया टिकट कैंसिल कर दूं?” मैंने निराशा भरी आवाज में पूछा।
“नहीं अभी कुछ नहीं कह सकते, अच्छा सुनो ट्रेन गाजियाबाद से होकर जाएगी ना?” आशीष भैया ने पूछा
“हां”
“कितने बजे पहुंचेगी?”
“तकरीबन बारह बजे”
“मैं गाजियाबाद में बैठ जाऊंगा, तुम सामान तैयार कर लो।”
“ठीक है भैया जी”

मुझे घर पर भी काम था, जिसे करते-करते शाम के पाँच बज गए। काम ख़त्म करके मैंने एक घंटा आराम किया। शाम छः बजे बाथरूम की टोटी खोली। मम्मी ने नहाने की वजह पूछी तो बताया एक हफ़्ता के लिए बाहर जा रहा हूँ। मम्मी ने मेरे लिए जल्दी से खाना तैयार कर दिया। मैंने खाना खाया, बैग में दो जोड़ी कपड़े और एक तौलिया लिया और मेट्रो कार्ड, एटीएम कार्ड और आधार कार्ड चेक किया। सब दुरूस्त थे। बैग पीठ पर उठाया और निकल पड़ा.. थोड़ी दूर जाकर याद आया मोबाइल का चार्जर भूल गया हूँ। वापस आया मोबाइल चार्जर और ईयरफोन ले लिया, मन किया कि बैग में लैपटॉप भी ले लें पर बैग भारी हो जाता इसलिए ये ख्याल छोड़ दिया।

मेट्रो में जैसे ही बैठा आशीष भैया का फ़ोन आया। भैया ने बताया “कार्यक्रम बीच में ही छोड़कर मैं भी आ रहा हूँ, हम पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर मिलेंगे। दिल्ली से ही साथ चलेंगे।”

मैं पुरानी दिल्ली पहुँच गया। आशीष भैया पहले ही वहाँ मेरा इंतज़ार कर रहे थे। कपड़ा और जुता वाला बैग अपने किसी दोस्त के रूम पर छोड़कर कार्यक्रम में आए थे वहीं से सीधा स्टेशन आ गए। मैंने सलाह दी कि अपने दोस्त को फ़ोन करके बैग यहीं मंगवा लीजिए। पर मेरा सजेशन भैय्या पहले से ही ट्राय कर रहे थे। समस्या ये थी कि जिसके पास रूम की चाभी थी वो बंदा फ़ोन ही नहीं उठा रहा था।

मैंने कहा “कोई नहीं भैया रहने दीजिए, मैं दो जोड़ी कपड़ा लेकर आया हूँ। इससे हम दोनों का काम चल जाएगा।”
” लेकिन हम ट्रैकिंग भी करेंगे, मैं चमड़े का जूता पहन रखा हूँ, इससे काम नहीं चलेगा। वो लड़का काॅल नहीं उठा रहा है।” आशीष भैया ने उस लड़के को चार-पाँच गालियां देने के बाद फिर से काॅल किया। फिर से उस लड़के ने काॅल पिक नहीं किया।

हमने सलाह मशविरा किया कि जूता और गर्म कपड़ा उत्तरकाशी बाजार से ले लेंगे। पुरानी दिल्ली स्टेशन के बाहर ठेले वाले से दो प्लेट छोले भटूरे पैक करवाए, बगल की दुकान से हमने बहुत सारे चिप्स, नमकीन और बिस्कुट भी ले लिए और सीधे प्लेटफार्म नंबर सोलह पर पहुंच गए, वहाँ मसूरी एक्सप्रेस खड़ी थी। हम S3 कोच में चढ़ गए। 42 और 43 नंबर सीट वाले कंपार्टमेंट में बैठ गए। उसी कंपार्टमेंट में कुछ बिहारी लड़के बैठे हुए थे उन्हें हरिद्वार कुंभ मेला में जाना था। लड़के आपस में मैथिली भाषा में बात करते हुए काफी शोर मचा रहे थे चूंकि मैं भी बिहार से हूँ और मैथिली भाषी हूँ। मुझसे रहा नहीं गया और मैं भी मैथिली में शुरू हो गया। बात करते-करते रात के बारह बज गए।

“अहाँ सैब सुत जै, टैम बहुत भै गेले ह! लैट स बांकि लोग क भी दिक्कत भै रहलय य…” मेरी बात सभी लड़के मान गए। वे लाइट स्विट्च आॅफ़ करके सो गए। हम भी सो गए।

आँख खुली तो पता चला ट्रेन हरिद्वार पहुँचने वाली है। लड़के अपना सामान लिए ट्रेन के गेट पर लाइन से खड़े थे। चाय वाले आ जा रहे थे। मैंने दो कप चाय ली और एक गिलास चाय आशीष भैया को देते हुए गुड मॉर्निंग कहा। कोच लगभग खाली हो गया था। हरिद्वार से देहरादून के लिए कोच में शायद हम दोनों ही थे। हमने दोनों तरफ़ से ट्रेन की खिड़की खोल दी थी। ट्रेन राजाजी नेशनल पार्क से गुजर रही थी। ट्रेन की रफ्तार धीमी थी। डोईवाला हाल्ट से आगे खिड़की से लंबे दांत वाला जंगली हाथी दिखाई दिया जो ट्रेन के गुजरने का इंतजार कर रहे थे। यूं तो जू में हाथी बहुत बार देख चूके हैं लेकिन जंगल में हाथी देखने का पहली बार अनुभव हुआ था। मन बहुत खुश हो गया था।

हम देहरादून सुबह ठीक 8:25 बजे आॅन टाइम पहुँच गए थे। कोरोना जांच की फॉर्मेलिटी पूरा करने के बाद स्टेशन से बाहर निकले। हमने फैसला किया वहाँ से परेड ग्राउंड तक पैदल ही जाएगें। 9 बजे हम परेड ग्राउंड पहुँच गए। वहाँ विश्वनाथ बस सर्विस की बस उत्तरकाशी जाने के लिए खड़ी थी। हमने बस की टाइमिंग पूछा तो पता चला बस दस बजे खुलेगी। हमने दो टिकट कटवा लिए चूँकि बस को खुलने में अभी समय था तो हम दोनों ढाबा में नाश्ता करने गए पर हमें मेन्यू पसंद नहीं आया। सामने सुलभ शौचालय था हम वहाँ से फ्रैश हो आए। नाश्ता के अन्य विकल्प के लिए परेड ग्राउंड का एक चक्कर लगाकर वापस बस के पास आ गए। रास्ते में खाने के लिए कुछ फल-फ्रूट्स ले लिए थे। बस करेक्ट दस बजे खुल गई। मसूरी, रौतु की बेली, चिन्यालीसौड़ बाजार होते हुए लगभग 4 बजे हम उत्तरकाशी पहुँच गए। सबसे पहले हमनें होटल में रूम लिया, होटल शिवानंद में चार सौ रूपए में डबल बेड रूम मिल गया था। हमें भूख बहुत तेज लगी हुई थी। कुछ नाॅन वेज खाने निकल पड़े एक रेस्टोरेंट में बिरयानी देखा तो वहीं जाकर भूख मिटाए। अभी शाम का टाइम था बाजार में खूब चहल-पहल थी। हम मणिकर्णिका गंगा घाट के लिए निकल पड़े। शाम के समय कुछ साधु-संत पूजा पाठ कर रहे थे। हम वहाँ नदी किनारे बने चबूतरे पर जाकर बैठ गए। भागीरथी नदी की कल-कल के शोर के साथ ठंडी-ठंडी हवा चल रही थी। मंदिर से घंटी की आवाज़ आ रही थी, चबूतरे के नीचे मछलियां खेल रही थी। बहुत ही रमणीय दृश्य था। हमने कुछ फोटो क्लिक किए और चबूतरे पर बैठकर ढ़ेर सारी बातें की। सांझ ढल गयी थी, अंधेरा फैलने लगा तो हम वापस रूम में आ गए।

रूम में डिस्कशन किए कि आगे कहाँ चलना है। पहले भटवारी से ऊपर रैथल गांव और ड्यरा बुग्याल के बारे में सोच रहे थे। लेकिन भैय्या ने कहा हमें ग्रेटर हिमालय में चलना चाहिए। मैंने भी सहमती जताते हुए हामी भर दी। फिर “हम सुखी गांव चलते हैं!” सुखी टाॅप मैं पहले कई बार जा चूका था। यहाँ गांव में कई लोगों से जान पहचान भी थी। मैंने एनएस राणा जी को फ़ोन लगाया उन्हें बताया कि अभी हम उत्तरकाशी में हैं। कल हम सुखी आएंगे, ऊपर बंदरपूँछ तक ट्रैकिंग करने का प्लान है। उन्होंने कहा “ठीक है टैंट और बर्तन हमारे पास है, भटवारी से रेंट पर स्लीपिंग बैग लाना पड़ेगा सौ रूपए पर बैग पर डे किराया लगेगा। राशन पानी अपना उत्तरकाशी से ले लीजिएगा। मैं सुबह नौ बजे भटवारी में आपका इंतजार करूंगा।”
उत्तरकाशी से जो-जो सामान लेना था मैंने उसे लिस्ट बनाकर भेजने को कहा और आग्रह किया कि टैंट और बर्तन का भी किराया बता दो क्योंकि हम उनका कुछ नुकसान नहीं करना चाहते थे। लेकिन वो मना करते रहे। बार-बार आग्रह करने के बाद उन्होंने हमसे एक बोतल शराब लेकर आने के लिए कहा। मैं काफी परेशान हो गया मेरे लिए धर्म संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई क्योंकि मैं शराब की बोतल से बहुत दूर रहता हूँ, अपने पैसों से किसी को शराब खरीदकर देना मेरे लिए नामुमकिन काम था। मैंने अपनी परेशानी उन्हें बता दी। उन्होंने इसका तोड़ निकाल लिया। बोले दिहाड़ी समझकर मुझे पैसे दे देना मैं भटवारी से ले लूंगा। अगली सुबह हम बाजार से लगभग दो हजार रूपए का राशन पानी का पूरा सामान ले लिया गया। जो दस दिन तक आराम से चल जाता।

आलू, प्याज, टमाटर, मटर, गाजर, गोभी, निमूड़े (पहाड़ी सब्जी) बंध गोभी, बैंगन, लहसुन, अदरक, निंबू आदि भी हमने सब्जी मार्केट से ले लिए। सामान बहुत ज्यादा हो गया था। कैरी करना बहुत मुश्किल हो रहा था फिर भी किसी तरह टैक्सी स्टैंड तक पहुँचे। रास्ते में एक जगह गाड़ी रूकी कुछ सवारी उतरकर एक दुकान में प्रवेश कर गयी। हमने ड्राइवर से पूछा तो पता चला ये लोग चिकन लेने गए हैं क्योंकि वो दुकान चिकन के लिए बहुत मशहूर थी। हमनें भी डेढ़ किलो चिकन ले लिया। एक घंटा बाद हम भटवारी पहुँच गए। एनएस राणा वहाँ सुबह नौ बजे से ही हमारा इंतजार कर रहे थे। हम लगभग एक बजे पहुँचे थे क्योंकि सामान लेने में समय लग गया था और टैक्सी भी लेट खुली थी। भटवारी में हमने एक हजार रूपए सिक्योरिटी मनी जमा करके दो स्लीपींग बैग लिए और एनएस राणा जी को बोतल के लिए दिल पर पत्थर रखकर पैसे दे दिए। एक हज़ार रूपए के दो बोतल ले लिया। हमें बंदरपूँछ तक ट्रैकिंग करवाएंगे..बहुत मेहनत करेगें यही सोचकर तसल्ली कर लिया।

लगभग तीन बजे हम सुखी टाॅप पहुँच गए। वहाँ दो और लड़के हमारा इंतज़ार कर रहे थे। एक गुजरात से था, वो भी ट्रैकिंग के लिए आया था और दुसरा लड़का लोकल ही था जिसे गुजराती लड़के ने पोर्टर के लिए हायर किया था। हमारे पास समय बहुत कम बचा हुआ था, हल्की बारिश भी होने लगी थी। हमने फैसला किया कि जहाँ पानी मिल जाए वहीं टेंट लगा लेंगे। हम सब लोगों ने अपने-अपने हिस्से का सामना उठाया ट्रैकिंग शुरू कर दिया। थोड़ा ही ऊपर पहुँचकर हम हांफने लगे क्योंकि पेट खाली था हम दिनभर कुछ खाए नहीं थे। बारिश भी तेज़ हो गई थी जिससे मुसीबत और बढ़ गयी। हमारे कपड़े गिले हो गए, सामान को भीगने से किसी तरह बचाया। लगभग तीन किलोमीटर ट्रैकिंग के बाद पानी का स्रोत मिल गया। हमने जल्दी से दो टेंट लगाए। अंधेरे होने लगा था। हमें जल्द से जल्द लकड़ी इकट्ठा करना था पर सब लकड़ी गीली हो गई थी। दूर-दूर तक सुखी लकड़ी खोजने गए पर आधा ही कामयाब हुए। मैंने और पोर्टर ने पत्थर जोड़कर चूल्हा बना लिया। मिट्टी तेल डालकर आग जलाया। बांकि तीन लोग अंधेरे में टार्च जलाकर लकड़ी ढूंढ रहे थे। रात के नौ बज गए थे हमारा खाना अभी भी तैयार नहीं हुआ था। मैं थोड़े फासले पर चिकन बना रहा था। पोर्टर रोटी और चावल बना रहा था। तीनों लोग भी कुछ और लकड़ियां लेकर आए। वे सब पोर्टर के पास एक बड़ा पत्थर पर बैठकर बातचीत करने लगे। एन एस राणा ने शराब पी लिया, पोर्टर ने भी पी लिया। ये दोनों अपना होश खो बैठे आशीष भैय्या से बहस करने लगे। मैं अभी भी चूल्हा के पास था चिकन तैयार करने में लगा हुआ था। अचानक से बहस तेज़ हो गई मैं बीच-बचाव करने गया तब तक पोर्टर ने आशीष भैय्या पर हाथ उठा दिया था। आशीष भैया भी उसे पीट दिया। मामला आउट आॅफ कंट्रोल हो गया था। मैंने आशीष भैया को रोका गुजराती लड़के ने पोर्टर को रोका। नशे में धूत एनएस राणा हमसे दस हजार रूपए मांग करने लग गए लेकिन पोर्टर आशीष भैया का मर्डर करने की बात करने लगा, हाथ में बड़ा सा चाकू ले रखा था। गुजराती लड़के ने पोर्टर को किसी तरह रोके हुआ था। मैंने आशीष भैया को नीचे टेंट के पास भेज दिया। अब एनएस राणा मेरे पीछे पड़ गया दारू की बोतल फोड़कर हाथ में ले रखा था बार-बार मर्डर करने की बात कर रहा था। गुजराती लड़के और पोर्टर ने मेरा बचाव किया। पोर्टर बोला पाँच हजार अभी रखो और तुम जाओ पर मेरे पास कैश नहीं था उन्होंने कहा फोऩ पे कर दो। मैंने बहाना बनाया कि मेरे पास सिर्फ तीन हजार रूपए हैं पर पोर्टर मानने को राज़ी नहीं था काफी रिक्वेस्ट करने के बाद तीन हजार पर आया। मैनें तीन हजार रूपये ट्रांसफर कर दिया। पोर्टर मुझे अब भी जाने नहीं दे रहा था बार-बार आशीष भैया का मर्डर करने की बात कर रहा था चूँकि आशीष भैया ने उसे पीट दिया था। अपनी बेइज्जती का बदला आशीष भैया का मर्डर करके लेना चाहता था। काफ़ी मशक्कत के बाद मौका देखकर मैं नीचे टेंट के पास आ गया, यहाँ आशीष भैया बैठे थे। हमने टेंट से अपना सामान लिया अंधेरे में ही नीचे उतरने लगे। उतरने का रास्ता हमें पता नहीं था, ऊपर से अंधेरा था हालांकि मोबाइल का टार्च आॅन कर रखे थे। चढ़ने में हमें दो घंटा लगा था उतरने में सिर्फ दस मिनट, यह एक चमत्कार ही था। शरीर में करंट दौड़ रहा था। शरीर के हार्मोन्स एक्टीव हो रखे थे। सुखी गांव में ही रामप्रसाद राणा अंकल जी से जान-पहचान थी। प्रकृति होम स्टे चलाते हैं, उन्हें काॅल किया। अंकल जी और उनका बेटा हमें खोजने आ गए। हमें अपने घर ले गए। एक रूम में ठहरने की व्यवस्था कर दिए। रात में अंकल जी हमारे लिए मैगी और चाय बना कर लाए चूँकि रात काफ़ी हो गई थी इसलिए अंकल जी बोले तुम लोग अभी सो जाओ सुबह बात करेंगे।

हमें नींद तो आने वाली नहीं थी हम और आशीष भैया बातचीत करने लग गए। अगर ये न होता तो वो होता वो ना होता तो यह होता… बातचीत चल ही रही थी कि काॅल आया। देहरादून पुलिस कंट्रोल रूम से क्योंकि भैया जब टेंट के पास आए थे तब सौ नंबर को काॅल कर दिया था। कंट्रोल रूम वाले ने हमसे लोकेशन पूछा। हमने बता दिया। फिर उत्तरकाशी से इंस्पेक्टर अमित जी का फ़ोन आया उन्होंने नाम पूछा भैया ने बताया आशीष मिश्रा। उधर से रिस्पांस आया उत्तरकाशी के एसपी भी मिश्रा जी हैं। इंस्पेक्टर अमित और आशीष भैया दोनों फोन पर ही दोस्त बन गए। हम दोनों को जून में होने वाली अपनी शादी में इन्वाइट कर लिए। दोनों की काफ़ी देर तक बात होती रही। कुछ देर बाद हर्षिल थाना से फ़ोन आया। उन्होंने कहा आप लोकेशन पर रहिए हम कुछ देर में आते हैं। पुलिस वाले पंद्रह मिनट में आ गए। सबसे पहले वो हमसे खाने के बारे में पूछे। हमने कहा हमारे पास नमकीन वैगरह है खा चुके हैं। पुलिस वाले ने हमसे सादा काग़ज पर शिकायत लिखने को कहा‌। हमने पूरी घटना तफसील से लिख दी। पुलिस वाले ने सांत्वना देते हुए कहा “बांकि हम सुबह देख लेंगे।” पुलिस जाने लगी तो मैंने एक बार पूछ लिया “आप लोग रात में ड्यूटी कर रहे हैं आप लोगों ने कुछ खाया कि नहीं?”
“खाने का मौका ही नहीं मिला!” पुलिस वाले ने उत्तर दिया। मैंने कहा हमारे पास कुछ नमकीन और बिस्कुट है, लेकर आता हूँ। पुलिस वाले मना करते रहे पर मैं अपने बैग में से कुछ पैकेट नमकीन और बिस्कुट ले आया। पुलिस वाले ने सिर्फ एक पैकेट बिस्कुट लिया और हमें शुक्रिया कहा। यही हमारी भारतीय संस्कृति है कोई प्यार से कुछ दें भले बिस्कुट का एक टुकड़ा ही क्यों ना हो लेना पड़ता है।

अगली सुबह जब हमारी आँख खुली तो घड़ी में आठ बज रहे थे। अंकल जी मेज़ पर चाय और मैगी रख गए थे। हमनें जल्दी से फ्रेश होकर नाश्ता किया। थोड़ी देर बाद उत्तरकाशी से इंस्पैक्टर अमीत का फ़ोन आया हाल-चाल जानने के लिए। ठीक उसके बाद हर्षिल थाणा से फ़ोन आया। पुलिस वाले ने बताया कि “दोनों अभियुक्तों को हमनें थाणा आने को कहा है। आप दोनों भी आ जाइए इनसे हम आपके पैसे वापस दिलवा देंगे। फिर आप कहिएगा तो एफआईआर दर्ज कर लेगें या अगर गलती कबूल करके माफ़ी मांग लें तो माफ़ करना चाहें तो माफ़ कर दीजियेगा।‌”

हमने अपना बैग रेडी कर लिया, हर्षिल जाने के लिए तैयार थे। जाने से पहले अंकल जी को बुलाकर रात-भर रूकने और रात में और सुबह जलपान कराए थे उनका पैसे पूछे कि कितना पे करना पड़ेगा? अंकल जी हमें डाँट कर विदा किए।

जैसे ही हम सड़क पर पहुँचे वहाँ गांव के प्रधान के साथ कुछ लोग हमारा इंतजार कर रहे थे। वहाँ पर एनएस राणा और पोर्टर भी था। हमसे माफ़ी मांगने लगे। हमारे पैसे वापस कर दिए। प्रधान ने भी दोनों को खूब लताड़ लगाया। मामला लगभग सुलझ गया था लेकिन थाणा अध्यक्ष हमें थाणा बुलाकर औपचारिकता पूरी करना चाहते थे। गुजराती लड़के भी हमारे साथ हो गए। हम पाँचों थाणा पहुँच गए। हमने लिखित में दे दिया कि हमारे बीच मामला सुलझ गया है। थानाध्यक्ष ने उन दोनों से भी माफीनामा लिखवा लिया। पुलिस वाले ने हम तीनों ट्यूरिस्ट को जाने को कहा और उन दोनों को वहीं रोक लिया।

गुजराती लड़के का हर्षिल में रूकने का प्लान था। वहीं रूम ले लिया लेकिन हमारा कोई प्लान फिक्स नहीं था। मौसम सुबह से ही बहुत खुशगवार हो रखा था, हल्की-हल्की बारिश भी हो रही थी हम आगे का प्लान बनाने लगे कि वापस घर लौटें कि गंगोत्री तक घूमकर आंए। आशीष भैया ने गंगोत्री तक चलने तक का फैसला किया। तकरीबन बारह ब़जे बारिश तेज़ हो गई। हम एक ढा़बा में चाय पीने बैठ गए और बारिश छूटने का इंतजार करने लगे उसी ढाबा में हमने खाना भी खा लिया। बारिश लगभग तीन बजे ख़त्म हुई ऊपर बर्फबारी हुई थी। हमें ठंड का एहसास होने लगा था हमारे पास जितने कपड़े थे पहन रखे थे, ठंड अभी भी लग रही थी। हम हर्षिल में ही रूम खोजने लगे, रूम तो बहुत एवलेबल थे पर जेब में कैश सिर्फ दो सौ रुपए बचे हुए थे। हम एटीएम की तरफ़ गए जो भारत और तिब्बत सीमा से पहले आखिरी एटीएम और बैंक है। बैंक मैनेजर ने हमें निराश कर दिया। कैश ख़त्म था। हम बहुत बुरे फंस गए थे। किसी भी होटल में कोई पेटीएम या गूगल पे नहीं ले रहा था। ठंड लगातार बढ़ती जा रही थी। वापसी का कोई रास्ता नहीं था ना हर्षिल में रूकने का इंतजाम हो रहा था। हम फिर से कैशियर के पास गए फिर से निराश लौटना पड़ा।

एटीएम से थोड़ी दूर आगे भागीरथी नदी पर एक पुल है जो हर्षिल को हाईवे से कनेक्ट करता है। फोटो बनाने के लिए जबर्दस्त लोकेशन है। नीचे मनोरम घाटी है, नदी के एक तरफ चीर और देवदार के घने जंगल है तो दुसरी तरफ़ सेब के बड़े-बड़े बगान है। बीच में तेज़ धारा में बहती भागीरथी नदी। ऊपर चोटियों पर बर्फ की सफेद चादर। अद्भुत नजारा देखकर हर कोई फोटो खींचने पर विवश हो जाता है। हम भी विवश हो गए। अलग-अलग एंगल से फोटो खींच रहे थे और सेना के गाड़ी के गुजरने का इंतजार भी कर रहे थे कि कोई गाड़ी सुखी या उत्तरकाशी की तरफ़ जाएं तो हम लिफ्ट मांग लें लेकिन एक घंटा हो गया कोई गाड़ी नहीं गुजरी।

हम विचार करने लग गए कि अब तो एक ही रास्ता है गुजराती लड़के से रिक्वेस्ट करें कि रात-भर हमें ठहरने दें। लेकिन तभी एक अंकल जी आए उनके एक पैर में चोट लगी हुई थी। डंडा के सहारे चलते हुए हमारे पास आए। हमसे रिक्वेस्ट किए कि फ़ोन से उनका फोटो खींच दें। हमने खींच दी। हमारे साथ भी खिंचवाए। फोटो खिंचवाने गुजराती लड़के भी आ गए थे। हमने ग्रुप में एक शानदार फोटो क्लिक की। अंकल जी से बातों बातों में पता चला कि वो घुमक्कड़ी के बहुत शौकीन हैं। हमनें उनसे जिक्र किया कि हमारे पास कैश ख़त्म है तो उन्होंने हमें बताया कि आखिरी पच्चीस सौ रुपए उन्होंने ही निकाले हैं। अंकल का नाम पूरन सिंह भाटी है। भाटी अंकल ने हमें अपने साथ आने के लिए कहा। हर्षील से तीन किलोमीटर ऊपर धराली गाँव हैं। वहीं भाटी अंकल रूम ले रखे थे। हर्षिल कैश और स्वेटर लेने आए थे। बारिश फिर से शुरू हो गई थी और अंधेरा भी छाने लगा था। हमें धराली जल्दी से पहुँचना था। गाड़ी के इंतजार में हम समय बर्बाद नहीं करना चाहते थे। हम पैदल ही शुरू हो गए। थोड़ी ही दूर पर आर्मी बेसकैंप थी। दस मिनट पैदल चलने के बाद कैंप के दुसरे गेट के पास पहुँच गए। एक फौजी ने आगाह कर दिया था कि आगे पैदल चलना खतरनाक हो सकता है क्योंकि आगे घना जंगल था जिसमें से बारहसिंगा और भालू हमला कर सकता था। हम वहीं गेट के पास धराली के लिए गाड़ी का इंतजार करने लगे। पाँच मिनट बाद एक चैंपियन गाड़ी आई, रिक्वेस्ट करने पर हमें बिठा लिया भाटी अंकल किसी तरह आगे एडजस्ट करके बैठ गए। मैं और आशीष भैया पीछे ट्राली में खड़े हो गए। बारिश में भीग जरूर रहे थे पर नजारे के आगे कुछ नहीं था। हमनें अपना-अपना फ़ोन निकाला और फेसबुक पर लाइव कर दिया। दस मिनट में धराली पहुँच गए।

भाटी अंकल जी दो सौ रूपए में रूम ले रखे थे। सौ रुपए और बढ़ाकर हम दोनों उसी रूम में एडजस्ट हो गए। होने के लिए तो चार लोग भी एडजस्ट हो जाते पर तीन जनों के लिए पर्याप्त जगह थी। लैटरिंग-बाथरूम भी अटैच था। कुल मिलाकर सौ रूपए में एक आदमी के लिए रूम मिल गया वो भी बिल्कुल अच्छी कंडीशन वाला रुम। हम रास्ते में भीगते हुए आए थे हमें ठंड लग रही थी। हमारे पास और कपड़े भी नहीं थे। ऊपर के कपड़े उतारकर रजाई में दुबक गए। रात नौ बजे खाना खाएं। फिर दुबककर सो गए..

अगली सुबह नींद खुली तो हमारी हैरानगी का कोई ठीकाना नहीं था। चारों तरफ़ बर्फ की सफेद चादर बीछी हुई थी और हल्की-हल्की बर्फबारी भी हो रही थी। मन खुश हो गया था। हम नाचने लगे थे। लेकिन ठंड और हवा हमें परेशान करने लगी थी। जुते और एक शर्ट भीग चुके थे। सौभाग्यवश मेरे बैग में गर्म टोपी रखा हुआ था। टोपी पहनने के बाद हवा से राहत तो मिला किन्तु शरीर में ठंड अब भी लग रही थी क्योंकि मैं सिर्फ एक शर्ट और ऊपर एक पतला सा बण्डी पहन रखा था। पैर भी नंगे थे। मैंने भाटी अंकल का हवाई चप्पल पहन लिया। अंकल को रूम में ही छोड़कर साहस करके आशीष भैया को लेकर रोड के साइड थोड़ा-सा नीचे भागीरथी नदी के किनारे फोटो क्लिक करने गए। खूब फोटो खिंचवाए, वीडियो बनाएं। बर्फ से खेलें। पानी में बहकर आए सेब चुन-चुनकर खाए, स्थानीय लोगों के अनुसार ये सेब पिछले साल के थे जो बर्फ़ में दब गए थे। मैं कुछ ज्यादा ही साहस दिखाने के लिए उत्साहित हो गया। नदी पार करके मुखबा साइड जाने के लिए ठंडे पानी में पैर रख दिया। अति उत्साह में मैं पानी की धारा का अंदाजा नहीं लगा पाया था बस दो कदम रखते ही मेरे पैर कांपने लगे। मैं जल्दी से पानी से बाहर आ गया। एक तो ऐसे ही ठंड और सुर्र-सुर्र चलती हवा के बीच बिना गर्म कपड़े और जूते के था। पानी में पैर रखने की जो बेवकूफाना गलती किया था शायद मेरी जान भी जा सकती थी।

कल्प केदार मंदिर के पास कुछ साधु लोग आग जलाकर बैठे हुए थे। मैं यहीं आकर बैठ गया। एक बाबा मेरे अच्छे दोस्त बन गए, आग के पास बैठे-बैठे ढ़ेर सारी हमने बातें की। उनकी कहानी सुनीं, बाबा पंजाब के मोगा से थे, पंद्रह साल के उम्र में घर छोड़कर संन्यासी बन गए, 35 साल से संन्यासी जीवन बीता रहें हैं। एक सेना से रिटायर्ड अफ़सर जो बाद में संन्यासी बन गए अभी 85 साल के हैं बाबा उनकी सेवा करते हैं, उनके लिए भीक्षा मांगकर लाते हैं, खाना बनाकर उन्हें खिलाते हैं। दो घंटे में बाबा ने अपने जीवन की पूरी गाथा बयान कर दी।

अब मैं गर्मा गया था। भूख भी लगने लगी थी। भाटी अंकल भी रूम से बाहर निकल आए थे। हम तीनों एक साथ ढाबा में खाना खाएं और रूम में आ गए। आगे का प्लान बनाएं कि अब गंगोत्री चलते हैं। हम तैयार हो गए। रोड़ पर कुछ देर गाड़ी का इंतजार करने लगे, आधा घंटा तक कोई गाड़ी नहीं आयी तो हम पैदल ही चल दिए यह सोचकर की आगे कोई गाड़ी आएगी तो हम रास्ते में ही रोककर बैठ जाएंगे। भाटी अंकल के पैर में चोट लगी हुई थी डंडे के सहारे चल रहे थे इसलिए हमें भी स्लो चलना पड़ रहा था। काफ़ी आगे चलने के बाद भी कोई गाड़ी नहीं आई। जंगल घना था और बिल्कुल सुनसान जगह थी। भालू या तेंदुआ के हमले का खतरा था। यात्रा अगली सुबह तक पोस्टपोन कर हम लौट आए।

हम लोग रूम में बैठे-बैठे अपने मोबाइल चला रहे थे। ख़बरें मिलने लगी कि दिल्ली में नाईट कर्फ्यू लगा दिया गया है। देश भर में कोरोना के मामले अचानक से बढ़ने की खबरें न्यूज़ चैनलों की पहली हेडलाइंस थी। सोशल मीडिया पर लॉकडाउन की खबरें भी तेज़ी से चल रही थी। घर से भी फ़ोन आने लग गया कि जल्दी वापस आ जाओ। गंगोत्री जाना अनिश्चितकाल तक पोस्टपोन हो गया। अगली सुबह हम जल्दी से उठ गए घर जाने के लिए तैयार हो गए। बैग पैक कर लिए, बाबा से मिलकर आशीर्वाद लिए। धराली से उत्तरकाशी के लिए जा रही गाड़ी में बैठ गए। बीच में एक जगह है गंगनानी यहाँ एक गर्म कुंड है। हम यहीं रूक गए नहाने के लिए। यहाँ अपग्रेड का काम चल रहा था इसलिए कुंड बंद था। लेकिन पानी का स्रोत बंद नहीं था। पानी के स्रोत को एक चबूतरे की तरफ़ मोड़ दिया गया था। चबूतरे पर तीन खाने बने हुए थे। ऊपर से पानी गिर रहा था बिल्कुल झरने की तरह। वहाँ पानी के दो स्रोत हैं एक गर्म और एक ठंडा चूँकि एक स्रोत का पानी लगभग 80°-90° गर्म निकलता है इसलिए उसमें ठंडे पानी की धारा को जोड़ दिया है ताकि पानी नहाने लायक हो जाए। हम लगभग वहाँ एक घंटा तक खूब जी भर कर नहाए। दोपहर का भोजन करके उत्तरकाशी के लिए निकल पड़े।

उत्तरकाशी हम 2 बजे पहुँचे। देहरादून के लिए डेढ़ बजे की आखिरी बस निकल चुकी थी। टैक्सी वाले 35 सौ रुपए किराया मांग रहे थे। हमारे पास रात-भर रुकने के अलावा और कोई रास्ता नहीं था। होटल शिवानंद में हमें चार सौ रुपए में रूम मिल गया। अगली सुबह 5 बजे ही बस थी। लेकिन हम मिस कर दिए। अगली बस 7 बजे थी। देहरादून के लिए हमारा सफ़र शुरू हो गया था। बीच में बस रौती की बेली में एक ढा़बा के पास रूकी। सभी यात्री ब्रेकफास्ट किए, हमने भी किया। ढाबा के बाहर बुरांश के जूश और निमूड़े (पहाड़ी सब्जी) का आचार दोनों का एक-एक मद ख़रीद लिया। साढ़े पांच घंटे बाद हम देहरादून पहुँच गए। भाटी अंकल हमें दिल्ली जाने वाली बस तक छोड़ कर गए। 1 बजे हम यूपी रोडवेज की बस में बैठ गए थे, सीट भी मिल गई थी। राजाजी नेशनल पार्क से होते हुए सहारनपुर पहुँचे, मुजफ्फरनगर, मेरठ होते हुए दिल्ली शाम पाँच बजे पहुँच गए। कश्मीरी गेट दिल्ली मेट्रो से घर तक पहुँच गए। यहाँ एक अजीब कहानी ख़त्म हुई।