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मनोहर पोथी के वह लेखक जिन्हें लोग बिहार के द्विवेदी के नाम से जानते थे- सुजाता कुमारी

मनोहर पोथी के वह लेखक जिन्हें लोग बिहार के द्विवेदी के नाम से जानते थे- सुजाता कुमारी

आचार्य रामलोचन सर  (18891971)  का नाम कई कारणों से प्रसिद्ध है। वे कवि एवं सम्पादक, व्याकरण एवं भाषा विशेषज्ञ, बाल साहित्य के रचयिता और अनेक लेखकों, कलाकारों, चित्रकारों के प्रेरक थे। इन्हें ‘बिहार का गिजूभाई’ और बिहार का द्विवेदी भी कहा जाता था उन्होंने कई पत्रिकाएँ निकाली जैसे- बालक पत्रिका, हिमालय पत्रिका, होनहार पत्रिका… साथ ही ‘मनोहर पोथी’, ’व्याकरण चंद्रिका’ और रामचरितमानस का मैथिली में अनुवाद किया।इनके द्वारा किए गये कार्य और सेवा को राजेंद्र प्रसाद और सच्चिदानंद सिन्हा ने भी सराहा था।

सन 1915 के जनवरी महीने में लहेरियासराय में एक छोटी सी झोपड़ी में इन्होंने  (पुस्तक भंडार) की स्थापना की। धीरे-धीरे इस पुस्तक भंडार पर बिहार सरकार की दृष्टि पड़ी, और 1929 में रामलोचन जी द्वारा लिखित पुस्तकों को हर कक्षा में पढ़ाने की मंज़ूरी दे दी गयी। और फिर 1930 में पटना में पुस्तक भंडार की शाखा खोल दी गयी। इस पुस्तक भंडार में शांति निकेतन से प्रशिक्षित उड़ीसा के उपेन्द्र महारथी भी काम करते थे। जिनके नाम पर पटना में एक शिल्प म्यूज़ियम भी है।पुस्तक भंडार के संदर्भ में जयंती स्मारक ग्रंथ में जनार्दन झा लिखते हैं- ‘’पुस्तक भंडार से साहित्यसेवी और विज्ञान जितना उपकृत और सत्कृत हुए हैं, उतना बिहार की दूसरी किसी भी साहित्यिक संस्था से नहीं। बिहार के इस गौरवान्वित ‘भंडार’ की यह उदारता सर्वथा प्रशंसनीय है।’’ एक बात यह भी ध्यान देने योग्य है कि जब इन्होंने प्रकाशन आरम्भ किया था तब कुछ ही प्रकाशक थे। नवलकिशोर प्रेस और खडगविलास प्रेस आदि…  पुस्तक भंडार के बाद इन्होंने ‘विद्यापती प्रेस’ भी लगाया था। 

1926 में रामलोचन सरन जी ने ‘बालक’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन किया।इसके संपादक  रामवृक्ष बेनीपुरी थे। (रामवृक्ष बेनीपुरी का पहले  नाम रामवृक्ष शर्मा था, लेकिन रामलोचन जी के कहने पर हीं उन्होंने बेनीपुरी लिखना आरम्भ किया था)।बेनीपुरी जी के बाद इसके सम्पादक शिवपूजन सहाय हुए। अच्युतानंद दत्त सहकारी सम्पादक थे। और अंत में रामलोचन जी ने स्वयं हीं सम्पादन का दायित्व ग्रहण किया।यह पत्रिका 48 पृष्ठों की होती थी।जिसमें चित्र के साथ बच्चों के लिए ज्ञानवर्धक, मनोरंजक और प्रेरक सामग्री का प्रकाशन होता था। यह भी बताया जाता था कि बालक को अपने जीवन को सफल बनाने के लिए क्या करने की आवश्यकता है। इस पत्रिका का एक उद्देश्य यह भी था कि बच्चों को वर्णमाला सिखाया जा सके। ‘बालक पत्रिका’ का स्तर इतना ऊँचा था कि ‘अमृत पत्रिका’ ने उसकी तुलना सर्वश्रेष्ठ ‘बंगाल बाल मासिक’ ‘संदेश’ से किया था। बालक के विशेषांक भी इतने अच्छे होते थे कि वे पठनीय और संग्रहणीय होते थे।  रामवृक्ष बेनीपुरी, दिनकर और आरसी प्रसाद सिंह समेत  हिंदी के कई बड़े साहित्यकार की रचनाएँ बालक में बड़ी धज के साथ छपती थी। निस्सन्देह यह कहा जा सकता है कि बाल साहित्य की सेवा और उसे आगे बढ़ाने में ‘बालक पत्रिका’ का ख़ास योगदान था।

पटना राजधानी थी इसलिए उन्हें लगा कि वहाँ जाकर वे हिंदी की बेहतर सेवा कर सकते हैं तो उन्होंने वहाँ ‘हिमालय’ नामक मासिक पत्रिका का प्रकाशन आरम्भ किया। ‘हिमालय’ के सम्पादन के लिए उन्होंने शिवपूजन सहाय का सहयोग प्राप्त किया और उनके निरीक्षण में ‘हिमालय’ के सम्पादन द्वारा जो हिंदी का कार्य हुआ उसे बताने की मुझे ज़रूरत भी नहीं लगती। वह सभी को भली प्रकार विदित है। यह ‘हिमालय’ की ही सबसे बड़ी विशेषता थी कि भारत गणराज्य के सर्वप्रथम राष्ट्रपति ‘’राजेंद्र प्रसाद’’ जी की आत्मकथा का सर्वप्रथम क्रम से प्रकाशन ‘हिमालय’ द्वारा ही हुआ था और उससे हिंदी-पाठकों में राष्ट्रपति की आत्मकथा को पढ़ने की भूख जागी थी। 

रामलोचन सरन जी अनाशक्त कर्मयोगी थे। इन्होंने रामधारी सिंह दिनकर, जानकी बल्लभ शास्त्री, मोहन लाल वियोगी, उपेन्द्र महारथी, हरिमोहन झा, आदि की रचनाओं को प्रोत्साहित कर ख्याति दी। इन्होंने स्वयं भी तुलसीदास के रामचरितमानस का मैथिली में अनुवाद किया।

जिस मनोहर पोथी को पढ़कर हम बड़े हुए हैं उसके रचयिता भी रामलोचन जी ही हैं। उन्होंने नौसिखियों को हिंदी सिखाने के उद्देश्य से इस बाल पुस्तक की रचना की थी।

उस समय  पूर्वांचल में हिंदी के जितने भी लेखक, कवि, नाटककार या पत्रकार विशेष रूप से प्रसिद्ध थे, उनमें कदाचित् ही ऐसा कोई साहित्यकार होगा जो रामलोचन जी के प्रश्रय में न रहा हो उनसे प्रोत्साहन न ग्रहण किया हो या उनकी छत्रछाया में उसने साहित्य की दीक्षा न ली हो।

इनके बारे में एक बात प्रख्यात है कि जब भी कोई इनसे मिलता था और अपनी पीड़ा, दुःख दर्द इन्हें कहता था तो ये उनकी मुसीबतों का हल निकालने के लिए लेख लिखा करते थे।

वर्णमाला और हिंदी को सुघड़ बनाने वाले इस बिहारी लेखक को ऐसे हीं बिहार का द्विवेदी नहीं कहा जाता।हिंदी और मैथिली साहित्य रामलोचन सरन जैसे लेखकों को पाकर सदैव गर्व महसूस करता रहेगा।मेरे लिए यह बात और गर्व की है कि रामलोचन जी का जन्म सीतामढ़ी की पुण्यधरती पर हुआ था। जो मेरा भी गृह ज़िला है।