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कुबेरनाथ राय का नदी सम्बन्धी प्रेम – सुजाता कुमारी

कुबेरनाथ राय का नदी सम्बन्धी प्रेम – सुजाता कुमारी

हिंदी साहित्य की निबंध विधा में ‘कुबेरनाथ राय’ का नाम प्रख्यात है। निबंध विधा और उसमें भी ललित निबंधकारों पर सदैव यह आरोप लगता रहा है कि वे निबंध की शुरूआत तो सरलता से करते हैं, किंतु समाप्त होते-होते इतने जटिल हो जाते हैं कि विषय का अर्थ पाठक वही नहीं लगा पाता जैसा लेखक प्रेषित करना चाहता है। इसकी एक वजह तो यह है कि निबंधकार जो विषय चुनता है वह कहीं-न-कहीं ऐतिहासिक, पौराणिक होने के कारण उन्हें भाषा का चयन भी उस काल को ध्यान में रखकर ही करना पड़ता है। कुबेरनाथ राय भी इस तरह की बातों से अछूते नहीं रहे। उनका विषय चयन भी क़रीबन इसी तरह का है। बावजूद इसके उन्होंने लोक के माध्यम से बड़ी-से-बड़ी बात को भी सरल ढंग से रखने की कोशिश की है। उनके निबंध की कई केंद्र बिंदु हैं। उसमें एक  बिंदु उनका “नदी सम्बन्धी प्रेम” है। इस प्रेम का एक कारण तो यही प्रतीत होता है कि उनका गाँव गंगा नदी के किनारे था। गंगा नदी से उन्हें विशेष स्नेह था। नदियों के माध्यम से उन्होंने कई तरह की संस्कृतियों का वर्णन भी किया है। वे नदियों के किनारे घंटों बैठा करते थे। जब भी गाँव आते थे तो नाविकों से ज़रूर मिलते थे। उनके साथ नौका विहार करने जाते थे, उनके अनुभवों को खूब रुचि लेकर सुनते थे। कई निबंधों में इस बात का ज़िक्र भी उन्होंने किया है। कई ऐसे लोकगीत जो नदियों से सम्बंधित है, उसको वे बिना फेर बदल के अपने निबंधों में लिखते थे। निषाद बांसुरी नामक निबंध में कुछ इसी तरह की पंक्तियों का उल्लेख है-

“गंगा मैया,
कोई जे सोवेला रन बन,
कोई जे बेइलिया बने हो!
कोई जे सोवेला बलुआ क रेतवा
त’ तोहरे सरन धइले हो!
गंगा मैया,
राजा जे सोवेला रन बन,
रानी बेइलिया बने हो!
मलहा त’ सोवेला बालू क रेतवा,
त’ तोहरे सरन धइले हो!”

कुबेरनाथ राय चूँकि स्वयं उत्तर भारत के थे, इसलिए अपने निबंधों में कई स्थान पर भिन्न-भिन्न प्रकार से उत्तर भारत की विशेषताओं का उन्होंने उल्लेख किया है। वे कहते हैं कि उत्तर भारतीय भूमि की कुछ दृश्यगत विशेषता है। जैसे- गंगा का निर्मल प्रवाह, आदिगन्त प्रसारी शस्यभूमि और भास्वर नील परमपद। वे मानते हैं कि नदी और धरती दोनों मिलकर ही रामचरित मानस के एक खुले पृष्ठ की रचना करते हैं। वे गंगा के भारतीय और उसके बाहरी सन्दर्भ में लिखते हैं कि- “परन्तु यही गंगा है, जब यह उत्तर भारत को पार करके बंगदेश में पहुँचती है तो इसका रूप कुछ और हो जाता है । तब इसका चेहरा विरज निर्मल नहीं रह जाता है, तब इसका रूप दूर्वादल श्याम और इसकी धार अधीर हो उठती है और हजार धाराओं में फट पड़ती है। वहाँ का आकाश मेघभरा मेदुर श्याम रहता है, वहाँ वातास सिमसिमा आर्द्र और नशीला होता है, वहाँ नदी के आसपास ‘तरु छाया-मसि माखा’ की स्याही घुली हरीतिमा रहती है, और उसके बाद आदिगन्त नरम सुन्दर धानी रंग का विस्तार ! कहीं भी खाली जगह नहीं । अंग-अंग भरा हुआ, अंग-अंग में कच्चा अपरिपक्व कौमार्य, धरती का अभुक्त षोडशी वपुविस्तार, इस नदी के कगार से सुदूर दिगन्त तक एक ही प्रकार का दृश्य है। प्रकृति की तपः पूत निराभरण भास्वरता का बंगाल की धरती पर अभाव है। वहाँ पर तो सबकुछ माया-श्यामल है, सबकुछ ही नयन महोत्सव है। बंगाल के मन में प्रवेश करके वेदान्त भी राधा-भाव से आविष्ट हो जाता है और शंकराचार्य ‘प्रच्छन्न नास्तिक’ कहकर अस्वीकृत कर दिये जाते हैं तो वहाँ की धरती की तो कोई बात ही नहीं। धरती तो यों भी स्वभाव से ही माया – भूमि है। वह कहीं भी वेदान्ती नहीं रहना चाहती । वेदान्त तो आकाश की भाषा है। परन्तु बंगदेश में यह आकाश मेघमुक्त कहाँ रह पाता है, जो वेदान्त का वितरण कर सके ? इसी से नदी यदि उत्तर भारत में विरजारूप धारण करती है, तो बंगभूमि में उसका रूप श्याम- शाद्वलशोभी और वृन्दावनी हो जाता है।” [1]

एक जगह उन्होंने वर्णन किया है कि गंगा जो है वह गोमुख से निकलती है। और इसका चरित्र भी वैसा ही है जैसा पयस्वला गाय का रहता है, जो अपने बछड़े के लिए ऐसे  रंभाती दौड़ती है, जैसे वह घर को लौट रही हो। और नदी के संदर्भ में यह बछड़ा और कोई नहीं बल्कि “भारतवर्ष” ही है। गंगा नदी के तट पर अकेले बैठकर इसके सस्वर ध्वनि को सुनिए तो ऐसा लगता है जैसे मंत्रों की साम वीणा बज रही हो। कुबेरनाथ राय की यह कल्पना है कि आर्यों ने सरस्वती की प्रवाह को सुनकर ‘ॐ’ की ध्वनि का आहरण किया होगा। और गंगा की प्रवाह ध्वनि को सुनकर ‘ग्वं’ को सीखा होगा। वे कहते हैं कि गंगा मूलतः निषादों की नदी है, क्योंकि सबसे पहले निषादों ने ही इसे ‘मातृका’ कहकर अपनी श्रद्धा को अर्पित किया था।

वे एक स्थान पर लिखते हैं कि – “गंगा शब्द निषाद भाषा का शब्द है। इसका शाब्दिक अर्थ होता है ‘नदी’ | ‘गं-गं गच्छति सा गंगा’ की उक्ति तो संस्कृत पण्डितों ने मनोविनोद के लिए कालान्तर में प्रचलित की है। जिस तरह ‘सिन्धु’ शब्द का मूल अर्थ ‘नदी’ है, वैसे ‘गंगा’ शब्द का भी। आज भी मानसरोवर के आसपास इस शब्द का प्रयोग जातिवाचक संज्ञा ‘नदी’ के रूप में होता है और सम्भवतः इसी से मानस यात्रियों में पहले भ्रम फैला हुआ था कि गंगा भी ब्रह्मपुत्र-सिन्धु की तरह मानस से ही निकलती है। प्राचीन काव्यों में भी यही भ्रम है। पर गंगा का वास्तविक उद्गम है गंगोत्री से ऊपर गोमुखी क्षेत्र | हमारी लोकभाषाओं में ‘गंगा’ शब्द का ‘नदी’ अर्थ अब भी सुरक्षित है। एक विशिष्ट रूपान्तर में भोजपुरी और बांग्ला में ‘गांग’ शब्द का प्रयोग होता है दो दलों या क्षेत्रों के बीच की विभाजक रेखा के लिए। ठीक यही कार्य नदी की धारा भी करती है। अत: ‘गंगा’ के पुराने अर्थ से इस शब्द का घनिष्ठ सम्बन्ध है। अँगरेज़ी का ‘रीवर’ शब्द ‘राइव’ क्रिया से बना है और इसका भी अर्थ विभाजक रेखा ही होता है। ‘गंगा’ शब्द मूलत: मानसरोवर के आसपास या हिमालय की पट्टी में विकसित शब्द – श्री का अंग है।”[2]

नदी की पूजा की एक विशेषता यह भी है कि वहाँ नदियों के किनारे पूरा हक़ घटवारिन का रहता है, और किसी विशेष सामग्री से नहीं बल्कि सामान्य से अक्षत, फूल, दूध, दीप से बिना किसी ब्राह्मण-बरुआ के महिलाएँ नदी को पूजती है। जहां किसी मंत्र के उच्चारण की ज़रूरत नहीं पड़ती बल्कि ‘ल गंगा मइया, सकल मनसा पूरन कर’ से ही सारे काम हो जाते हैं। वे लिखते हैं कि-  मैं मन ही मन सोचता हूँ – “हम नदी के तट पर हवन गाहें-बेगाहे करते ही हैं, अतः आर्य पितर सन्तुष्ट ! हम नदी को हार-फूल और गीत अर्पित करते हैं, अतः द्राविड़ पितामह सन्तुष्ट ! हम नदी को बलि और अर्घ्य-धार अर्पित करते हैं, अतः निषाद प्रपितामह भी सन्तुष्ट ! गोया यह नदी नदी न होकर भारतीय इतिहास का चिन्मय प्रवाह हो!”[3]

नदी और माँझी का सम्बंध अटूट होता है। उसके लिए उसका सारा संसार नदी ही है। नदी से ही खान-पान नदी से ही रोज़गार, नदी ही माँ और नदी ही प्रेमिका। कई बार कहा जाता है कि जो असली माँझी होता है उसका विवाह बहु से न होकर नदी से ही होता है। उनके जीवन में ‘चार मास नारी, आठ मास नदी’ का संग ही बदा रहता है।

भारतीय नदियों का यह महत्व है कि जिस तरह भारतीय जाति की रचना में चार नस्लों के धागे हैं- आर्य, निषाद, किरात, और द्राविड के। उसी तरह भारतीय जाति के चारों धागों के सांस्कृतिक प्रवाहों की चार प्रतीक चार नदियाँ है- सरस्वती (आर्य), गंगा (निषाद), ब्रह्मपुत्र (किरात), और कावेरी (द्राविड़)

वे एक स्थान पर कालिदास का ज़िक्र करते हुए कहते हैं कि उनका एक श्लोक है जो मन में कई प्रश्नो को जगाता है। कि यह सरस्वती नदी है कहाँ, या कम-से-कम थी कहाँ? यों तो सरस्वती वैदिक युग की नदी है। सिर्फ़ भारत ही नहीं, अखंड और बृहतर भारत की ऐतिहासिक स्मृतियाँ इस नाम के साथ जुड़ी हुई है। वे प्रोफ़ेसर बर्नाफ़ का ज़िक्र करते हैं जिन्होंने सरस्वती नदी के नाम से ईरान की हरक्वती नदी की कल्पना की थी। वे कहते हैं- “मुझे लगता है कि ईरानी ‘हरक्वती’ और भारतीय ‘सरस्वती’ दोनों किसी प्राचीनतर नदी की स्मृतिवाहक संज्ञाएँ है, जिस से भारतीय ईरानी दोनो आर्य कबीले परिचित थे। भारतीय ‘स’ का ईरानी ‘ह’ में रूपांतर तो कई शब्दों के संदर्भ में देखा जाता है : सिंधु>हिंधु>हिंदू, मास>माह>, अस्मद>अस्म>अहम>हम, सप्ताह>हप्ताह>हफ़्ता। ये शब्द संभवत रूपांतर नहीं, समानांतर रूप है। इसी प्रकार ‘सरस्वती’ का प्रतिरूप ‘हरक्वती’ हो जाना असंभव नहीं। ‘स’ का ‘ह’ में रूपांतर तो अपने देश में भी कई प्रदेशों के उच्चारण में हो जाता है। अपने देश के पंडितों में एक प्रचलित उक्ति है, जो मूलतः भाषा-शास्त्र का एक सूक्त है, “सरितो हरितो भवति सरस्वत्य हरस्वत्य।” और अपने देश में एक प्रचलित मज़ाक़ है ‘अरे भाई कामरूपी पंडित को नमस्कार कैसे करूँ। उसके मुख में तो ‘शतायु’ ‘हतायु’ बन कर उच्चारित होगा। संभवतः इस उच्चारण के फेर से ही तांत्रिकों ने ‘श्री’ और ‘ह्रीं’ दोनों को एक हाई बीज मंत्र का रूपांतर माना है। और तो और ऋग्वेद में ही दोनो रूप प्राप्त होते हैं। ‘सरस्वती’ तो कई बार आया है पर “तममतुर्दुच्छना हरस्वती” (ऋ. २२३६) में दूसरा रूप भी मौजूद है। अतः हम निष्कर्ष निकाल सकते है कि भारतीय ‘सरस्वती’ और ईरानी ‘हरक्वती’ – दोनों एक ही प्राचीन आर्य सरिता की स्मृति का संरक्षण-संवाहन करती है। उक्त सरिता का लोप हो गया, पर उसकी महा भास्वर स्मृति इन दोनों नामों में प्रवाहित है।”[4]

कुबेरनाथ राय समुद्र किनारे बैठकर नदियों की धार पर लिखने वाले व्यक्ति नहीं थे। वे गाँव से सदैव जुड़े रहे, चाहे वहाँ का लोकगीत हो, वहाँ की गँवई भाषा हो, वहाँ का खान-पान हो, या फिर वहाँ के पोखर या नदियाँ ही क्यों न हो। उन्होंने इन सभी पर छककर लिखा है। नदी से वे किस तरह वाक़िफ़ थे। इस बिंबात्मक वाक्य में हम देख सकते हैं-  “मुझे याद आती है माघ की ठिठुरती सुबह, जब मैं अपनी स्थानीय नदी ‘पगला दै’ अर्थात् ‘पगला दह’ के धूम्र-धुन्ध कगार पर खडा रहता हूँ, ठण्ड से फूटती उँगलियो से कांटे में चारा लगाता हूँ और सतह को चीरता कांटा पानी के भीतर प्रवेश कर जाता है । साथ ही, सतह पर चक्राकार गुदगुदी फूटती दिखाई पड़ती हैं, गोया कुहासे को मोटी रज़ाई में दुबक कर सोयी नदी की पतली अचंचल धार को इस भिनुसारे मैं अपनी शय्या त्याग, उस का केश सहला कर नही, जगह-बेजगह चिकोटी काट कर जगा रहा हूँ। तब लगता है, नदी कुनमुनाती है और निद्रा से भारी फूली हुई सुन्दर पलकें खोल कर मेरी ओर मुग्धा-रोष से देखती है। उधर लोभी लालची वंसी इस की देह में विहार करती है और लुब्धक की तरह मछलियों को फंसाने में तत्पर है। आज मेरी बारी हैं। आज मैं कुहासे की रुईदार रजाई ओढ़े पतली सुप्तधार नदी को चिकोटी काट कर जगा रहा हूँ। पर कभी वह दिन भी आता है जब मैं इस के रुद्र रूप को देख-देख भयकम्पित गात से थर-थर कांपता हूँ । माघ की सुबह, फाल्गुन को शाम और चैत्र की राका रात्रि में इस नदी का चेहरा बड़ा नरम, बड़ा मोहक लगता है । यह तब कैशिकी वृत्ति में रहती है । पर मुझे याद आती है इस कामरूपिणी  को आरभटी मुखाकृति जब वरसात में यह उमड़ती है और अपने यौवन-ज्वार में चार घण्टे-छह घण्टे के भीतर तालुका-तहसील, गांव-घर, ताल-तलैया एक करती प्रलय मचा देती है। कितनी हरीतिमा का भक्षण कर डालती है, कितने जीवों की जान ले बैठती है। इसी से इसका नाम ‘पगला दै’ अर्थात् उन्मादिनी नदी।” [5]

जमुना भारतीय संस्कृति की मुख्य नदी है। “जंबूद्वीप” भी वैदिक युग का नहीं है। यह शब्द जो है वह महाकाव्यों और पुराणों से चालू होता है। और बौद्धों ने इसे ‘भारत’ के प्रतिशब्द के रूप में प्रयुक्त किया था। उन्होंने कई तरह से इन नदी के नामों को सार्थक करने का प्रयास किया है। उन्होंने लिखा है- “यमुना शब्द का मूल ‘जम्बु-ना’ अर्थात् ‘जम्बूक्षेत्र की नदी’ – हो सकता है। किरात भाषा में ‘ना’ और ‘ना’ (नाम् ) का अर्थ जलधारा या नदी होता है । ‘मेनाम’ अर्थात् ‘मेनां’ (माता नदी ) । ‘मेघना’, ‘मेघ’ अर्थात् ‘मेझ’ या ‘मेच ‘ लोगों की नदी । बंगाल – असम को मेच-कोच देश कहते हैं । मेछ या मेच नाम की जन जातियां अभी भी वहां हैं । असम में है ‘कोच’ और बंगाल में है ‘मेच’ । बोडो जाति आज में असम में ही हैं । परंतु इस नस्ल के लोग समस्त भारत में पहले थे । यह किरातों की भारतीय शाखा ‘भोट’ (भोद – बोद-बोडो) का नामांतर है । बोडो का रूप ‘पोदो’ हो गया । ‘पोदो’, ‘पद्दो’ या ‘पद्द’ पुष्प ही ‘पद्म’, ‘पुष्प कमल’ है । ‘पोदोना’ का ‘पदुना’ फिर ‘पद्मा’ (संस्कृतकरण) हुआ । मेघना और पद्मा दोनों बंगाल क्षेत्र की नदियां हैं। पद्मा तो गंगा ब्रह्मपुत्र की मिली धारा ही है । इसी से मेघना जा मिलती है । इसी से मेघना का स्थानीय नाम जमुना । जमुना, मेघना, पद्मा (पदुना) के अंदर ‘ना’ ध्वनिखंड किरात है । अर्थ है नदी या जलधारा । थाईलैंड की नदी ‘मे-नाम्’ में ‘मे’ का अर्थ है ‘माता’; ‘नाम्’ या ‘नां’ का अर्थ है नदी । यमुना का ही दूसरा नाम है कालिंदी । यह कालिंदी वस्तुतः संस्कृतकरण है मूल किरात शब्द ‘काली – दी’ का । काली अर्थात् कृष्ण वर्ण की । ‘दी’, ‘दै’ और ‘ती’ ध्वनियों का किरात अर्थ होता है जलधारा । ‘दी’ का ‘ती’ रूप आर्यखंडों में ज़्यादा प्रचलित है परंतु असम में ‘दई’ (दै ) तथा ‘दी’ । ‘गाङ्ती’ (गोमती ), ‘राप्ती’ (राप्ती), नर्ब-दी (नर्मदा ) । अतः ‘कालीदी’ ही रहा होगा । यमुना के काली होने की कल्पना पुरानी है । यमुना अपेक्षाकृत गहरी नदी है इसी से इसका पानी काला दिखाई देता है । अन्य उदाहरण दक्षिण की ‘कीश-ना’ (कृष्णा ) भी है। कृष्णा नदी के क्षेत्र में ही ‘कीश’ (वानर) जाति थी।”[6]

भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में नदियों को माता माना जाता है। लोक में और भी कई तरह के सम्बंध इन नदियों से लोगों के रहते है। इसके किनारे के बैठकर कई तरह की पूजा वे लोग करते हैं। साथ ही इसके संरक्षण के कई प्रयास ग्रामीण क्षेत्र के लोग करते हैं। कई तरह के गीत नदियों पर बनाए गये है। ये नदियाँ सिर्फ़ पानी की लम्बी सी पोटली नहीं है, बल्कि ये मनोमय बिम्ब के साथ हीं भारतीय जाति की परमस्मृति में युग-युगांतर से प्रवाहमान एक बिम्ब  है। इन नदियों को कभी हम मानुषी परिवेश में देखते हैं तो कभी मानवेतर भगवती के रूप में। नदियों की एक ख़ास विशेषता यह भी है कि वह न देश की सीमा देखती है, न राज्य की सीमा, न ही कोई धर्म, न ही कोई जाति न गरीब न अमीर। वह एक राज्य से दूसरे राज्य में बिना किसी भेदभाव के प्रवेश कर जाती है। उसके अंदर जो भी प्रवेश करता है वह खुले मन से उसका स्वागत करती है। चाहे वह मनुष्य हो, कोई प्यासा पशु हो या फिर कोई पक्षी ही क्यों न हो। नदी सबके लिए समान है। यही तो बात है कि इसे हम माँ की संज्ञा देते हैं। वस्तुतः हमारी प्रार्थना के, प्रेम के, दुःख-सुख के अनेक दृश्य इन नदी के साथ जुड़े हुए हैं। कुबेर नाथ राय ने जलदेवता की तुलना जीवनदेवता तक से की है। वे लिखते हैं- “जीवन जल का ही नाम है। हम जो गंगातटीय भारतीय है, हमारे लिए जीवन-लीला के मूल में है- जल-लीला। हमारी मिट्टी, हमारी फ़सल, हमारी रोटी-डाल सब कुछ तो इस नदी-जल की ही लीला का, उसी की नवरसमयी भूमि का अवदान है। अतः यह शब्द हमारे लिए अधिक सार्थक है। यह नदी सचमुच ही हमारे लिए ‘जीवन-देवता’ है।”[7]

कई बार यह सुनने में आता है कि यमुना ‘कलिंद’ पर्वत से निकली है। इसलिए उसे ‘कलिंदजा’ या ‘कालिन्दी’ भी कहते हैं। किंतु नदी का रंग श्याम वर्ण का क्यों होता है इसकी व्याख्या ‘वामन पुराण’ में कथा द्वारा कही गयी है- हुआ यह कि सती की मृत्यु के पश्चात शिव जो हैं, वे कामार्त होकर विकल विचरण कर रहे थे। न कहीं विराम था, न कहीं शांति और न ही क्षमा। ‘शिव’ की रमण-तृष्णा और आर्ति का उपशम शक्ति को छोड़कर और कौन कर सकता है। विकल चित्त तो थे हीं घूमते-घूमते एक दिन दुग्ध स्त्रोता नदी यमुना के तट पर आ निकले और उन्हें अपनी प्रेमिका गौरी का स्मरण हो आया। वे नदी में कूद पड़े। फलतः उनके कामार्त्त आलिंगन और अवगाहन से नदी का जल काला पड़ गया। तभी से इसका नाम ‘कालिन्दी’ हुआ क्योंकि इसने परम संवित् रूप शिव की अंजनवर्णी काली वासना को अपने अंदर धारण कर लिया था और इसी से ‘काली’ पड़ गयी थी। यहाँ वामन पुराण यह संकेत करता है कि कालिन्दी संज्ञा में ‘काली नदी’ का अर्थ छिपा है और यमुना परम्परा से काली अर्थात् नील-वर्णी मानी भी गयी है। इसका प्रवाह पथ गहरा है और गहरी नदी स्वाभाविक है कि श्यामाभ दिखाई दे। इस प्राकृतिक तथ्य की व्याख्या के लिए वामन पुराण के कवि ने एक मिथक रच दिया है।

इसी तरह के कई मिथक हमारे लोक में भी विद्यमान रहते हैं। कई कथाएँ तो बिलकुल ऐसी रहती है जो यथार्थ सी प्रतीत होती है। नदियों से कई तरह के सम्बंध उसके किनारे रहने वाले बताते हैं। कई नाविकों की रोज़ी-रोटी भी इस तरह की कथा सुनाकर चलती है। नदियों में नाव पर सवार लोग भी बड़ी रुचि से इस तरह की कथाएँ सुनते हैं। इलाहाबाद के संगम पर जब मैं गयी तो मुझे भी एक नाविक ने कुछ इसी ढंग की कथा सुनाई। नीचे प्रस्तुत तस्वीर उन्हीं लम्हों की है-

कुबेरनाथ राय का नदी सम्बन्धी प्रेम

अतः हम पाते हैं कि नदियों से कुबेरनाथ राय का गहरा सम्बन्ध था। वैसे भी कुबेरनाथ राय लोक और संस्कृति से जुड़ाव रखने वाले निबंधकार थे। और नदी हमारी संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है, जिसके किनारे कई संस्कृतियाँ फूली-फली। कई समाज वहाँ रचे-बसे। अब जहां समाज होगा, साहित्यकार भी वहीं होगा। यही सब कारण है कि कुबेरनाथ राय ने नदियों पर लिखा। और नदियों पर भी इस ढंग से लिखा जो कारगर ज्ञान ही प्रस्तुत करती है, उसमें उथलापन नहीं है। राय जी ने नदियों की उत्पत्ति से लेकर उसके अर्थ तक को परिभाषित करने का कार्य किया है।

कुबेरनाथ राय का नदी सम्बन्धी प्रेम
कुबेरनाथ राय (1933-1996)

संदर्भ ग्रंथ : –

[1] निषाद बांसुरी, द्वितीय संस्करण, कुबेरनाथ राय, 2021, प्रतिश्रुति प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 31-32

[2] निषाद बांसुरी, द्वितीय संस्करण, कुबेरनाथ राय, 2021, प्रतिश्रुति प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 39-40

[3] निषाद बांसुरी, द्वितीय संस्करण, कुबेरनाथ राय, 2021, प्रतिश्रुति प्रकाशन, पृष्ठ संख्या- 85

[4] गन्धमादन, कुबेरनाथ राय, 1972, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 20

[5] गन्धमादन, कुबेरनाथ राय, 1972, भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 151-152

[6] उत्तरकुरु, कुबेरनाथ राय, 1996, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 14

[7] उत्तरकुरु, कुबेरनाथ राय, 1996, नेशनल पब्लिशिंग हाउस, नई दिल्ली, पृष्ठ संख्या- 45

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