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अनुभव : यात्राओं की – रहमत

अनुभव : यात्राओं की – रहमत

कहते हैं कि किताबें पढ़ने से ज्यादा ज्ञान यात्रायें करने से आती हैं।

किताबें हमें दर्पण की तरह आभास कराती है मगर यात्रायें हमें वास्तविक अनुभव कराती है। यात्रायें आपकी पाठशाला भी होती है और एक ऐसी दोस्त भी जो आपकी हर सुख दुःख को इत्मीनान से सुनती है। मैं पिछ्ले डेढ़ साल से फेसबुक पर सुक्खी टाॅप के बारे में लागातार लिख रहा हूं। हजारों लोगों का ध्यान आकर्षित हुआ, सैकड़ों लोगों ने सुक्खी टाॅप आने की मंशा जाहिर की..

27 नवंबर 2021 को सुखदेव विहार मेट्रो स्टेशन से रात की अंतिम ट्रेन गुजरी तो उस समय स्टेशन पर मेरे अलावा कोई नहीं था। मैंने सेल्फी क्लिक करके फेसबुक पर पोस्ट कर दिया। बगल में ही रहने वाले बड़े भाई लुकमान अहमद ने मेरी पोस्ट देखी तो अगले दिन अपने यहां बुलाया। चाय के साथ खूब सारी बातें हुई जब दो घुमक्कड़ी पसंद लोग साथ बैठें तो बातचीत यात्राओं से संबंधित ही होती है। हमारे साथ भी यही हुआ दोनों के मिजाज एक जैसे लगने लगे हमारा लंबा साथ चलने वाला था। उस दिन हमनें सुक्खी टाॅप और घुमक्कड़ी के बारे में विस्तार से बातचीत की। उसी दिन हमनें साथ में सुक्खी टाॅप यात्रा करने का भी प्लान बनाया। अभी ईद वाले दिन वो तारीख आ गई जब हम दिल्ली की गर्मी का अनुभव सुदूर हिमालय के ठंडे इलाक़े के लोगों से साझा करने के लिए निकल पड़े थे

त्योहार के दिन घर में सुबह से रात तक काफी व्यस्तता रहती है। मेरे घर पर मेहमानों का आना-जाना लगा हुआ था और मैं अपना बैग लिए ओखला बर्ड सेंचुरी मेट्रो स्टेशन के लिए निकल पड़ा जहां से लुकमान भाई अपनी Xuv से मुझे साथ लेना था। हमें दिल्ली से निकलते-निकलते अंधेरा हो गया था। रात 8 बजे NH 24 हाईवे से पूरी रफ्तार से देहरादून के लिए जा रहे थे। मेरठ में हाईवे चेंज हो गया लेकिन रफ्तार नहीं मुजफ्फरनगर, रूरकी, हरिद्वार होते हुए हम देहरादून रात 12 बजे पहुंच गए। देहरादून से हमारी एक फेसबुक मित्र को पिक करना था। वो चंडीगढ़ से आ रही थी, लेट थी, 3 घंटे। हमसे रात में इंतजार करना कठिन हो रहा था लेकिन हमने पूरे सब्र के साथ उनके आने तक इंतजार किया और हम करते भी क्यों नहीं वो अकेले रात में बस से सफ़र जो कर रहीं थी ऐसे में हम पर जिम्मेदारी बनती हैं। वो सिर्फ हमारे भरोसे थी, आखिरकार वो सुबह 3 बजे पहुंची। साढ़े 3 बजे सुबह हम सभी साथी देहरादून से सुक्खी टाॅप के लिए रवाना हुए। थोड़ी देर बाद पहाड़ी सफ़र शुरू हो गया। देहरादून शहर नीचे रह गया था। ऊंचाई से जगमगाता हुआ पूरा शहर दिखाई दे रहा था। मसूरी के आसपास रास्ता भटक गए थे लेकिन गनीमत रही 4-5 किलोमीटर बाद वापस सही रास्ते पर आ गए। सुदूर गांवों में जलती हुई बल्बें ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानों आसमान से तारे-सितारे ज़मीन पर आ गया हो।

लगभग एक घंटे बाद अंधेरा ओझल होता जा रहा था। उजाला पसरती जा रही थी। सूरज की अरूणिमा चीड़ के पेड़ों पर एक अलग ही खुबसूरती बिखेर रही थी। हम अपनी रफ़्तार से ‘रौतु की बेली’ रिज क्राॅस कर रहे थे। जैसे-जैसे उजाला बढ़ती जा रही थी प्रदूषित धुआं भी बढ़ती जा रही थी। बंदरपूंछ, काला नाग, स्वर्गारोहिणी जैसी बर्फिले चोटियों दिखाई देने की तो दूर की बात थी धुआं के कारण सामने वाला पहाड़ भी नहीं दिख रहे थे। गर्मियों में पहाड़ों पर वनाग्नि (जंगलों में आग) की घटनाएं बढ़ती जा रही है जिसके कारण पहाड़ों पर भी दिल्ली जैसी ही प्रदूषण के हालात हो रहे हैं। दिखने से धुंध लगता है लेकिन असल में प्रदूषण होते हैं। जी मचलना और उल्टी जैसे माहौल ने सबको हतोत्साहित कर दिया था। उत्तरकाशी तक ऐसा ही रहा। हम सुबह लगभग 9 बजे उत्तरकाशी पहुंचे। यहां फ्रेश हुए, पेट्रोल पंप पर गाड़ी की टंकी फुल कराए। हम आगे के लिए निकलने ही वाले थे कि सुक्खी से अंकल जी का फ़ोन आया
“हां रहमत कहां पहुंचे?”
“नमस्ते अंकल जी, अभी हम उत्तरकाशी में हैं”
“नमस्ते अरे सुन तेरी आंटी बीमार पड़ गई है रात में हर्षिल गई थी वहीं से तबियत बिगड़ गई है। खाना खुद बनाना पड़ेगा जो तुम लोग खाओगे वो सब्जी वहीं से लेते आना थोड़ी असुविधा होगी एडजस्ट कर लेना “
“आंटी को अब आराम तो है ना? हम सब्जी यहीं से लेते आएंगे”
“हां आराम है.. तुम बेफिक्र आ जाओ”

हमने तय किया कि सब्जी भटवाड़ी से लेंगे। थोड़ी देर बाद हम भटवाड़ी पहुंच गए। हमने यहां हरी सब्जियां ली और आगे के लिए रवाना हो गए। अब फिजाएं बदलने लगी थी। हवा में ठंडक और पहाड़ों की खुशबू आने लगी थी। सेबों के बगीचों की हरियाली मन को मोह रही थी। एकदम से वातावरण चेंज हो गया था। अब महसूस हो रहा था कि पहाड़ों में आएं हैं, खुबसूरती बढ़ती जा रही थी। कुछ ही देर में सुक्खी टाॅप पंहुचने वाले थे।

लगभग 11 बजे हम सुक्खी टाॅप पहुंच गए। गाड़ी पार्क की और अपने रुम में सामान रखकर अंकल आंटी जी से मिले। हम रात से ही भूखे थे। हमने जल्दी जल्दी खाना बनाने की तैयारी शुरू कर दी। किचन में सामान की कमी थी तो पास के दुकान से लगभग एक हजार रुपए का राशन-पानी लेकर आए। दाल चावल बनाकर खाए और थोड़ी देर यात्रा की थकावट मिटाने के लिए सो गए। आंखें खुली तो घड़ी में शाम के छः बज रहे थे। अगला दिन हमें कंडारा बुग्याल ट्रेकिंग पर जाना था इसलिए कुछ जरूरी सामान हर्षिल से लाना था। हम तैयार होकर हर्षिल पहुंच गए। हर्षिल से मटन या चिकन लेने गए थे वो तो नहीं मिला लेकिन उसके विकल्प के तौर पर पनीर मिल गया। थोड़ा और सामान लिए… लेकिन हर्षिल घुमने के लिए समय नहीं बचा था अंधेरा हो गया था। हम वापस सुक्खी टाॅप लौट आए।

हमें सुबह 5 बजे ही ट्रेक के लिए निकलना था लेकिन हम 2 घंटा लेट उठे। तसल्ली से फ्रेश हुए। राश्ते में खाने के लिए सैंडविच तैयार किए। कुकिंग के लिए सारा सामान और बर्तन पैक करके लेट सेट सुबह 8 बजे ट्रेक के लिए निकल पड़े। शुरूआत में काफी तेज चले, हर कदम के साथ खुबसूरती बढ़ती जा रही थी। हिमालय के बर्फीली चोटियां मानों हमारे करीब आते जा रहे हों। हमारे हर कदम के साथ सफेद चोटियों की आकार बढ़ती जा रही थी। रास्ते में उगे रंग-बिरंगी फूल, हरियाली, पानी के छोटे-छोटे स्रोत और पक्षियों के कलरव हमारे मन को बहुत भा रहे थे। हम पूरे जोश के साथ आगे बढ़ रहे थे। कुछ देर बाद रास्ते में एक जंगल पड़ता है, हम वहां एक थुनेर के पेड़ के नीचे विश्राम के लिए रूके लेकिन हमारे साथ हमारी चंडीगढ़ वाली साथी वो बहुत उत्साहित थी। काफ़ी आगे निकल चुकी थी। हम डर गए, परेशान होकर इधर-उधर ढूंढने लगे। ज़ोर-ज़ोर से आवाज़ें लगा रहे थे, कोई रिप्लाई नहीं आ रहा था। हमारी हताशा बढ़ती जा रही थी। हम आवाज़ लगाते हुए आगे बढ़ रहे थे। दूर पत्थर पर बैठी उनकी नारंगी कलर की जींस नज़र आई। मैंने उन्हें अपनी पूरी ताकत से आवाज लगाई, उनके रिप्लाई पर आखिरकार हमारी जान में जान आई। हम तेजी से उनके पास गए, पत्थर पर बैठी फोटोग्राफी कर रही थी। कभी तितलियां तो कभी फूलों, कभी पहाड़ों के खूबसूरत फोटो क्लिक कर रही थी..

हमने तय किया कि अगर कोई भी इस तरह से ग्रुप से अलग हो जाए है तो रास्ते में निशान छोड़ते जाएं और जोर-जोर से आवाज लगाएं हांलांकि टाॅप तक जीओ, एयरटेल और बीएसएनएल का नेटवर्क आता है लेकिन हमारे दो साथियों के फोन में वोडा आईडिया का सीम थे। इसलिए ट्रेक के इस बेसिक रूल के बारे में डिस्कस करना जरूरी था।

हमारे पैर फिर से मंजिल की तरफ़ बढ़ने लगे। लगभग एक घंटे के ट्रेक के बाद हम एक खुबसूरत स्पाॅट पर अखरोट के पेड़ के नीचे बैठकर आराम करने बैठे, कुछ खाए-पिए। फोटोग्राफी के लिए जगह बहुत खुबसूरत थी, सामने से श्रीकंठ शिखर, द्रौपदी का डंडा, ब्रत्या कुंड शिखर दिखाई दे रही थी। सबके फ़ोन निकल आए थे, कैमरे चालू हो गए थे। मुझे कैमरा चलाना नहीं आता इसकी पोल खुल चुकी थी। लुकमान भाई ने मुझे समझाया कि “आज के समय एक घुमक्कड़ को कैमरा चलाना आना अनिवार्य है क्योंकि हर क्षेत्र में डेवलपमेंट हुई है। हमने जो एक्सप्लोर किया है उस रियल अनुभव को अपने तक सीमित ना रखकर छोटी-बड़ी सभी खुबसूरत अनुभव को खुबसूरती से कहानी में पिरोकर यात्रा को जीवंत बनाने का जरिया कैमरा है और तुम जिस मकसद से सुक्खी टाॅप पर हो उसमें तो कैमरे का सबसे अहम रोल होगा”

फोटोग्राफी सेशन लगभग एक घंटा चला। लेट हो रहे थे मंजिल अभी आधा भी नहीं आया था। हम आगे बढ़े। बीच में एक छोटा सा दर्रा पार करना था। वहां तक जाने के लिए एक रास्ता शाॅर्ट कट था और एक मुख्य रास्ता था। मैंने शाॅर्ट कट रास्ता अपनाया तो ग्रुप के बांकि लोगों ने मुख्य रास्ते आना ठीक समझा। मैं जल्दी से दर्रा पार कर गया और टीम का इंतजार करने लगा। काफ़ी देर तक कोई कोई चहल-पहल नहीं हुई, मैंने ज़ोर ज़ोर से आवाज़ें लगाई लेकिन कोई रिप्लाई नहीं आया। मैं डरने लगा था कि कहीं वे लोग जंगल की ओर तो नहीं मुड़ गए। मैं आवाज लगाते-लगाते खोज रहा था। अचानक मेरे फ़ोन पर घंटी बजी लुकमान भाई की काॅल थी, तब जाकर मेरी जान में जान आई। हम दुबारा एक साथ हो गए थे। इस बार मुझे खूब डांट पड़ी, मुझे मेरी ईमिच्योरिटी का एहसास हुआ। हमने तय किया कि आगे मुख्य रास्ते से ही चलेंगे और सबसे पीछे मैं रहुगां। हम लाईन में अनुशासन के साथ फिर से चलने शुरू कर दिए। डेढ़ घंटे चढ़ाई करने के बाद सबके पैरों में थकावट साफ़ महसूस हो रही थी। सबका एक ही सवाल “और कितना रह गया है?”
मेरा भी एक ही जवाब होता था। “बस थोड़ा और”
काफ़ी देर तक ‘खट्ठा मीठा’ फिल्म के जाॅनी लिवर का ‘अब्भी ठीक करके देता हूं’ वाला सीन चलता रहा। एक समय सबके सब्र का बांध टूट गया, आगे चलने को कोई तैयार नहीं था। सबको मुझसे भरोसा उठ गया कि मुझे रास्ता मालुम ही नहीं है, सस्ता गाइड का टैग लगा दिया। पहाड़ के मौसम का कोई भरोसा नहीं होता खासकर उच्च हिमालय के मौसम का तो कोई सैटेलाइट भी अंदाजा नहीं लगा सकता 5 मिनट में मौसम बदल जाता है। अचानक हमारे सिर के ऊपर काले बादल मंडराने लगे, मेघ की गड़गड़ाहट ने सबको डरा दिया।हल्की-हल्की बारिश भी शुरू हो गई थी। लुकमान भाई ने मुझसे पूछा “फाईनली बताओ और कितना रह गया है?”
मैंने इशारा करते हुए कहा “वो बस वहां तक पहुंचना है बमुश्किल 2% रास्ता बचा है”
लुकमान भाई ने पूरी टीम से कहा “हमने जब इतना मुश्किल सफर सर्वाइव कर ही लिया है अब यहां से वापस लौटना तो हमारी बेवकूफी ही होगी इसलिए सारी मुश्किलों के बावजूद हमें आगे बढ़ना होगा”

हमारी यूनिट में एक बार फिर जोश भर गया। हम ट्रेकिंग पर आगे बढ़ने लगे.. पहाड़ों पर मौसम भी बड़ा मूडी होता हैं कब बदल जाए कहा नहीं जा सकता। फिर से सिर के ऊपर काले बादल उमड़ पड़े, तेज गरज के साथ बारिश अठखेलियां कर रही थी। हमारे थके हुए पैर मंजिल की तरफ बढ़ती जा रही थी। लक्ष्य बहुत करीब था। 50 कदम की चढ़ाई के बाद टाॅप पर पहुंच चुके थे, लक्ष्य प्राप्त करने का अपना एक अलग ही आनंद होता है और जिस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए बड़ी चुनौतीपूर्ण हालात का सामना करके वहां पहुंचे और वो खुबसूरती वहां मिल जाए तो शरीर का रोम-रोम रोमांचित हो जाता है। उस समय की खुबसूरती के एहसास को शब्दों में बयां नहीं किया जाता हांलांकि सामने विशालकाय बंदरपूंछ शिखर बादलों से ढके हुए थे लेकिन बंदरपूंछ बेस कैंप, ब्रह्मीताल ये नजर आ रहे थे। काफ़ी ठंड थी वहां, ऊपर से तेज-तेज हवाएं चल रही थी। हमें जल्दी से टेंट लगाना था लेकिन पानी का स्रोत अभी और दूर था यह जानकर सबके होश उड़ गए। एक बार फिर मेरे ट्रेक कराने की क्षमता पर सवाल उठ खड़े हुए। लेकिन टेंट वहीं लगाया जाता है जहां पानी और ईंधन के लिए लकड़ी हो। फैसला हुआ कि वापस थोड़ा नीचे जाकर टैंट लगाया जाए और पानी स्रोत से भरकर लाया जाए। ऊपर ठंड भी थी इसलिए वहीं से पानी भरकर ले आएं और नीचे आकर टेंट लगाया। समय बहुत कम था सबकुछ जल्दी-जल्दी करना था। पनीर बिरयानी बनाने का प्लान कैंसिल करके सिर्फ मैगी बनाने का फैसला किया। हमने कैंपिंग का पूरा मज़ा लिया। खूब फोटोग्राफी की और ढेर सारी मस्ती की। शाम ढलने लगी थी। सामने की हिमालय के बर्फीले शिखर पीले रंग से रंग गए थे। हमें वापस जाना था। सारा सामान पैक किए, जो आग जलाए थे उसे बुझा दिए और सारा कचरा बैग में भर लिए एक भी प्लास्टिक छोड़ना उस खुबसूरत जगह के लिए बड़ी नाइंसाफी होती। सुबकुछ तसल्ली से चैक करने के बाद वापसी के लिए निकल पड़े। अंधेरा छाने लगा था। मोबाइलों की टाॅर्च आॅन हो गई थी। घना अंधेरा छा गया था। झींगुरों की आवाजें सन्नाटों को चीरती हुई बराबर कानों में आ रही थी। मैं आगे-आगे अंधेरे में रास्ता दिखाते हुए चल रहा था। कभी आवाक से कोई पक्षी पेड़ से उड़ जाते तो कभी कुछ टूटने की आवाजें हमारे जान हलक में डाल देते लेकिन हमारे डगमगाते थके हुए पैर रूके नहीं। हमें लौटने में सिर्फ तीन घंटे लगे। रात के दस बज चुके थे। हमें रात का डीनर भी बनाना था। सब इतने थके हुए थे कि जहां बैठे थे वहां से उठने की हिम्मत नहीं थी। अकेला मैं बचा था आखिर सबकी जिम्मेदारी मेरे ऊपर थी, मैं कैसे थकावट को दिखा सकता था। कभी अंकल जी बुलाकर कुछ बोलते तो कभी गांव के अलग-अलग लोग जिन लोगों ने मुझे ट्रेक के लिए जाते देखा था फोन करके एक्सपीरियंस पूछते। इधर किचन की सफाई और सब बर्तन धोने की टेंशन अलग थी। किसी तरह से पनीर बिरयानी और चटनी बनाया, रात के 12 बज गए थे।

सुबह देर से आंख खुली। हमें गर्रतांग गली जाना था और वापसी में धराली, हर्षिल घुमते हुए उसी दिन शाम में दिल्ली के लिए वापस लौटना भी था। इसलिए हमने अपने पूरे समान पैक करके और साफ़ सफाई करके ही निकले सो इस चक्कर में हमने नाश्ता भी नहीं बनाया और बिना कुछ खाए पीए निकल पड़े। गर्रतांग गली में 2 किलोमीटर के ट्रेक करने के बाद लकड़ी की सीढ़ी आई जिसे देखने के लिए काफ़ी लोग आए हुए थे। हम लोगों ने फोटोग्राफी की और लौट आएं। धराली में एक रिवर साइड एप्पल गार्डन में कुछ मस्ती किए। समय की कमी के चलते हर्षिल और मंदाकिनी फाॅल नहीं जा सके। हम धराली से ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए। लगभग रात के दो बजे हरिद्वार पहुंचे। बस स्टैंड से चंडीगढ़ वाली साथी को बस में सीट दिलाकर हम लोग वापस दिल्ली के लिए रवाना हो गए। यह यात्रा मेरे लिए बहुत बेशकीमती साबित हुई। छोटी छोटी बातें जिसे अक्सर हम इग्नोर कर देते हैं लेकिन उसका भी अपना ख़ास महत्व होता है। मैंने इस यात्रा से छोटी-छोटी बेसिक्स बातें सीखी। मैंने विपरीत परिस्थितियों में आलोचनाएं सुनने और जिम्मेदारी निर्वहन करने की गुण को सीखा। इस यात्रा ने मुझे अपनी नैतिकता को परखने का अवसर दिया। जितना कुछ इस एक यात्रा ने सिखाया शायद ही कोई किताब पढ़कर इतना कुछ सीख पाता…

कुछ तस्वीरों से आप उन यात्रओं को जी सकते हैं। जो मैंने जिया…

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