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कॉलेज के दिन

20 जुलाई 2017 बृहस्पतिवार को माॅनसुन की उमस भरी धूप में जिस कॉलेज में पहली कदम रखा था, वो मेरे जीवन का सबसे बड़ा ऐतिहासिक दिन था! जिसने मुझे आज इस काबिल बना दिया है कि मैं अपनी लेखनी के माध्यम से, शब्दों के माध्यम से, विचारों के माध्यम से, अपनी बात अपने समाज में, अपने देश में रखने को तैयार हूँ। अपनी संस्कृति, समाज और शिक्षा व्यवस्था को साथ लेकर आधुनिकता के रास्ते पर जाता हुआ एक संस्थान जिसमें छात्र-छात्राओं को अपने सपने साकार करने के नित नए अवसर मिलते हैं। और वे उसमें सफल भी होते हैं, चूंकि हर तरह के क्षेत्र में आगे बढ़ने और मुकाम हासिल करने के लिए राह दिखाने वाले हर तरह के प्राध्यापक यहां मौजूद हैं, और उन आदर्शों पर बढ़कर राह स्वयं प्रशस्त हो जाती है।
जी हां, मैं बात कर रहा हूं आत्मा राम सनातन धर्म महाविद्यालय की। दिल्ली विश्वविद्यालय का एक बहुप्रतिष्ठित संस्थान, जिसे ए.आर.एस.डी के नाम से ज्यादा जाना जाता है। ना जाने कितने यहां से पढ़कर संगीत के क्षेत्र में, कला के क्षेत्र में, विज्ञान के क्षेत्र में और साहित्य आदि के क्षेत्र में अपनी सेवा इस देश को दे रहे हैं। मुझे आज यह कहते हुए बड़ा गर्व महसूस होता है कि हां मैं ऐसे संस्थान का छात्र रहा हूं जहां सिर्फ पढ़ना ही नहीं बल्कि अपने हौसलों और अपने सपनों को उनकी मंजिल तक पहुंचाने का रास्ता भी बताया जाता है।
तीन सालों के हिंदी स्नातक के दौरान ऐसा शायद ही कोई दिन रहा हो जिस दिन हमने वहां कुछ नया ना सीखा हो! भले ही मैं हिंदी विशेष का छात्र था, किंतु उन तीन सालों में जितना ज्ञान हिंदी में अर्जित किया, उतना ही वहां इतिहास भी पढ़ा, राजनीति विज्ञान भी पढ़ा, अर्थशास्त्र भी पढ़ा और विद्यालय में होने वाली अनेकों गतिविधियों में हिस्सा भी लिया। साहित्य से संबंधित अनेकों सोसाइटी के सदस्य रहा सिलेबस से हटकर खूब ज्ञान अर्जित किया। फिर मौका मिला इतिहास विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अजीत कुमार सर के सानिध्य में ‘अंबेडकर स्टडी सर्कल’ में काम करने का। सर के मार्गदर्शन में बाबा साहेब अंबेडकर जी को बहुत करीब से जाना और उनके ‘पे बैक टू सोसायटी’ सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए पिछड़े हुए समाज के बच्चों के एक छोटे-से समूह को शिक्षा देने की जिम्मेदारी लिया और सफल भी हुआ और यह काम निर्वतमान में भी जारी है।

हिंदी विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर अरविंद कुमार मिश्र सर ने मेरे जीवन को निखारने में जो योगदान दिया उसको कभी भी नहीं भूल सकता। उसी का नतीजा है कि आज मैं देश के विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के लिए कैंपेन मैनेजमेंट का काम करने लायक बन पाया और अपने माता पिता के दिल्ली में अपना घर होने के सपने को साकार करने में सक्षम हो पाया और अपने लिए सुदूर उच्च हिमालय और प्रकृति के गोद में बसा ‘सुक्खी गांव’ में अपने लिए घर बना सका।

आत्मा राम सनातन धर्म महाविद्यालय में हमारे प्राचार्य डॉ. ज्ञानतोष कुमार झा, जो स्वयं हिंदी के छात्र रहे, हिंदी के प्राध्यापक रहे और फिर उनके दिशानिर्देशों में महाविद्यालय को नई-नई ऊंचाइयां मिलनी प्राप्त हुई। कॉलेज में हिंदी विभाग के प्राध्यापकों ने मिट्टी से घड़ा बनाने वाले कुम्हार की भूमिका निभाई है। डॉ रेणु बाला मैम, डॉ श्रीधरम सर, डॉ रश्मि बहल मैम, डॉ आशा पांडेय मैम का अध्यापन, सहयोग और आशीर्वाद मैं कभी नहीं भूल सकता।

हमारे कॉलेज की खास बात यह थी कि आपको जो कुछ करने का मन है, आप उस गतिविधि को करने के लिए स्वच्छंद है! स्वतंत्र हैं! किसी को नाटक में दिलचस्पी है तो उसके लिए रंगायन के दरवाजे खुले हैं! किसी को संगीत में दिलचस्पी है तो उसके लिए सारंग के दरवाजे खुले हैं! किसी को साहित्य में रुचि है तो वह कभी भी डॉ अरविंद सर से घंटो तक किसी विषय पर चर्चा कर सकता है और उन्होंने कभी इसके लिए मना नहीं किया और हमेशा उस बच्चे का स्वागत किया जो भी साहित्य में कुछ करना चाहता है! हिंदी विभाग के सभी प्राध्यापकों ने हिंदी की विधाओं पर बहुत अच्छे से पढ़ाया! सिलेबस के अलावा भी ना जाने कितनी ही किताबों को पढ़ने-समझने, लेखकों से मिलने, उनसे साक्षात्कार करने और विभिन्न गतिविधियों को कॉलेज में कराने के अनेकों-अनेक अवसर दिए। आज मुझे कहते हुए बड़ा गर्व होता है कि जो कुछ मैं करना चाहता था, जो कुछ मैं बनना चाहता था जो कुछ भी हासिल करना चाहता था, उन सभी सपनों को, हौसलों को, अपेक्षाओं को, उम्मीदों को वहीं से उड़ान मिली। इससे पहले मैं छठी से बारहवीं तक राजकीय विद्यालय बिंदापुर का छात्र रहा। वहां भी बहुत-सी चीजें सीखी थी, उसी की मार्फत में आत्मा राम सनातन धर्म महाविद्यालय तक पहुंच पाया था। और जो कुछ वहां सीखा था उन्हीं का परिमार्जन यहां आकर हुआ।

कॉलेज में अनेकों दोस्त बने, ऐसे दोस्त जो भाई से बढ़कर हैं। सिर्फ मेरे ही विषय के नहीं, अनेकों दूसरे विषयों के भी ऐसे दोस्त बने जो आज भी मेरे साथ हैं और शायद हमेशा मेरे साथ रहेंगे।

कॉलेज के उन गलियारों को कैसे भूला जा सकता है! जो स्टाफ रूम से लाइब्रेरी तक ले जाते थे, लाइब्रेरी से मैदान तक या कैंटीन तक! एक छोटी सी दुनिया में संसार था और मैं उस संसार का हिस्सा था। आज कॉलेज में ना रहने पर भी वह दिन हमेशा याद आते हैं जब किसी प्रतियोगिता में कोई पुरस्कार मिलने पर सर्टिफिकेट और ट्रॉफी को हाथ में लिए भागते हुए अपने प्राध्यापकों के पास जाकर उस खुशी को बांटते थे! अपने दोस्तों के पास जाकर बड़े खुश होते थे! कॉलेज में होने वाले फेस्ट में तीनों साल में जितना आंनद लिया आज यादकर दिल को सुकून मिलता है।

कॉलेज में रहकर कॉलेज परिसर पर, दोस्तों पर और अनेक विषयों पर बहुत सी कविताएं लिखी, बहुत से लेख लिखे, कहानियां लिखी और वे कॉलेज की पत्रिका में विभिन्न समाचार पत्रों में प्रकाशित भी होती थी। उस समय मेरे लिए बहुत बड़ी खुशी हुआ करती थी।
कॉलेज के तीन साल इस छोटे-से लेख में समाहित कर पाना बहुत मुश्किल काम है। ऐसी बहुत-सी बातें हैं जो इससे बाहर हैं, ऐसे बहुत-से किस्से हैं जो याद तो हैं पर उन्हें कलमबद्ध करना संभव नहीं! किसी याद को लिखना एक इम्तिहान की तरह होता है और मैं समझता हूँ कि इस इम्तिहान को कभी इत्मीनान से लिखा जाएगा।

  • रहमत
    2017-20 बैच
    हिंदी विशेष
  • वर्तमान में
  • एम. डी. इलेक्शन गुरु।
  • ‘सुहाना सफ़र’ बतौर संस्थापक घुमक्कड़ी और पर्यावरण संरक्षण क्षेत्र में काम
  • साथ ही एम. ए. हिंदी का छात्र